हिन्दुविरोध– कांग्रेस की पुरानी आदत

 

लेकिन कांग्रेस में ऐसे देशभक्त हिन्दू कार्यकर्ताओं की बहुत बढ़ी संख्या है, जो असंगठित हैं व एक दूसरे में विश्वाश की कमी की वजह से, इन देशद्रोहियों की जुंडली के देशविरोधी-हिन्दुविरोधी षड़यन्त्रों का मुंहतोड़ जबाब देने में अपने आप को असहाय महसूस कर रहे हैं इसलिए खामोश हैं।

उन्हें अपनी चुपी तोड़ते हुए एक दूसरे पर विश्वास करते हुए संगठित होकर इस देशद्रोहियों की जुंडली को बेनकाब कर अपदस्थ करना होगा और देशभक्त लोगों को कांग्रेस के शीर्ष पदों पर बिठाकर कांग्रेस के देशविरोधी-हिन्दुविरोधी जिहादी आतंकवाद व धर्मांतरण समर्थक कदमों को रोककर देशभक्ति की राह पर चलाना होगा ।

नहीं तो हिन्दुस्थान की जनता ये मानने पर मजबूर हो जाएगी कि हरेक कांग्रेसी देशविरोधी-हिन्दुविरोधी जिहादी आतंकवाद व धर्मांतरण समर्थक है और देश मे आए दिन बम्ब विस्फोटों में मारे जाने वाले निर्दोष हिन्दुओं, सैनिकों, अर्धसैनिक बलों व पुलिस के जवानों के कत्ल के लिए जिम्मेवार है।

परिणाम स्वरूप ये सब मिलकर कांग्रेसियों के खून के प्यासे हो सकते हैं क्योंकि अब कांग्रेस के पाप का घड़ा भर चुका है । भगवान राम-जो करोड़ों हिन्दूस्थानियों के आस्था विश्वाश और श्रद्धा के केन्द्र हैं-के अस्तित्व को नकारना व सनातन में विश्वाश करने वाले शांतिप्रिय हिन्दुओं व सैनिकों को आतंकवादी कहकर जेलों में डालकर बदनाम करना-इस पाप के घड़े में समाने वाले अपराध नहीं हैं।

· वैसे भी कांग्रेस की स्थापना एक विदेशी अंग्रेज ए ओ हयूम(जो ब्यापार के बहाने भारत आकर धोखा देकर देश को गुलाम बनाने बाली ईस्ट इंडिया कंपनी का अधिकारी था) ने 1885 में विदेशियों के राज को भारत में लम्बे समय तक बनाए रखने के लिए अंग्रेजी शासकों के सहयोग से की थी । तब इसका मूल उदेश्य था क्रांतिकारियों की आवाज को जनसाधारण तक पहुंचने से रोकना और ये भ्रम फैलाना कि जनता का प्रतिनिधत्व कांग्रेस करती है न कि क्रांतिकारी।

· इसकी स्थापना का कारण बना 1857 का स्वतन्त्रता संग्राम जिससे अंग्रेजों के अन्दर दहशत फैल गई ।

· आओ ! जरा नमन करें, शहीद मंगलपांडे, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ,शहीद तांत्य टोपे, शहीद नाना साहिब जैसे अनगिनत शहीदों को जो राष्ट्र की खातिर बलिदान हुए।

· कांग्रेस की स्थापना के बाद कुछ समय तक अंग्रेजी शासकों को किसी अंदोलन का सामना नहीं करना पड़ा लेकिन धीरे- धीरे क्रांतिकारियों ने कांग्रेस को अपना मंच बना लिया । शहीद भगत सिंह , शहीद राजगुरू, शहीद सुखदेव, शहीद चन्दरशेखर आजाद, शहीद बाल गंगाधर तिलक , शहीद लाला लाजपतराय, शहीद विपन चन्द्र पाल जैसे असंख्य क्रांतिकारी कांग्रेस से जुड़े और देश के लिए बलिदान हुए ।

पर मोहन दास जी व नेहरू जी के नेतृत्व में कांग्रेस का एक ग्रुप क्रांतिकारियों को कभी गले न लगा पाया । वरना क्या वजह थी कि नेताजी सुभाषचन्द्र वोस (जिन्होने 1939 में कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में पट्टाभीसीतारमैइया जी को हराया जिनका समर्थन मोहन दास जी कर रहे थे) को कांग्रेस छोड कर आजाद हिन्द सेना बनानी पड़ी ।

· शहीद भक्तसिंह जैसे प्रखर राष्ट्रवादी देशभक्त के बचाव में यह ग्रुप खुलकर सामने नहीं आया उल्टा उनको गुमराह क्राँतिकारी कहकर उनके देश की खातिर किए गए बलिदान को अपमानित करने का दुःसाहस किया । यह ग्रुप या तो अपने आप को बचाने में लगा रहा या फिर मुस्लिमों के तुष्टीकरण में लगा रहा ।

मोहन दास जी व नेहरू जी ने मुस्लिमों को प्रसन्न करने के लिए उनकी हर उचित-अनुचित, छोटी-बड़ी मांग को यह सोच कर माना, कि इनके लिए त्याग करने पर इनके अन्दर भी राष्ट्र के लिए प्यार जागेगा और ये भी हिन्दुओं की तरह शान्ति से जीना सीख जायेंगे ।

परन्तु हुआ उल्टा मोहन दास जी व नेहरू जी ने मुस्लिमों को प्रसन्न करने का जितना ज्यादा प्रयत्न किया वे उतने ज्यादा अशान्त होते चले गये ।

परिणाम हुआ धर्म के नाम पर देश का विभाजन । मुसलमानों के लिए पाकिस्तान व हिन्दुओं के लिए वर्तमान भारत । सरदार बल्लभभाई पटेल व वीर साबरकर जी ने कई बार इनके गलत निर्णयों का विरोध किया लेकिन इन पर तो धर्मनिर्पेक्षता-बोले तो-मुस्लिम तुष्टिकरण का ऐसा भूत सबार था जिसने देश को तबाह कर दिया।

उधर देश का धर्म के आधार पर विभाजन स्वीकार कर लिया । अंग्रेजों को लिख कर दे दिया कि नेताजी सुभाष चन्द्रवोस जैसा घोर राष्ट्रवादी क्राँतिकारी जब भी हिन्दुस्थान आएगा तो उसे उन दुष्ट- डकैत साम्राज्यबादियों के हवाले कर दिया जाएगा, जिन्होंने 300 वर्ष तक इस देश का लहू पानी की तरह बहाया व देशछोड़ते वक्त अपने लिए काम करने वाले को कुर्सी पर बिठाया । इधर लोगों को यह कहकर बरगलाना शुरू कर दिया कि देश आजाद करवा दिया । आज तक लोगों को यह नहीं बताया कि अगर पाकिस्तान की ओर से हस्ताक्षर सैकुलर पुराने काँग्रेसी मुहम्मदअली जिन्ना ने किए थे तो भारत की ओर से सैकुलर काँग्रेसी ज्वाहरलाल नेहरू ने किए थे या किसी और ने ?

clip_image001 उधर मुसलमानों ने हिन्दुओं का कत्लेआम शुरू कर रखा था इधर मोहन दास जी व नेहरू जी हिन्दुओं को यह कहकर बरगलाने में लगे हुए थे कि वो हमारे भाई हैं जो हिन्दुओं का कत्लेआम कर रहे हैं , हिन्दुओं की माँ बहनों की इज्जत पर हमला कर रहे हैं इसलिए आप कायर और नपुंसक बनकर हमारी तरह तमाशा देखो, जिस तरह क्रांतिकारी देश के लिए शहीद होते रहे देश छोड़ते रहे और हम अपने अंग्रेज भाईयों से सबन्ध अच्छे बनाए रखने के लिए तमाशबीन बने रहे ब क्रांतिकारियों को भला बुरा कहते रहे।

clip_image001[1] 1947 में धर्म के आधार पर विभाजन स्वीकार कर मुसलमानों के लिए अलग पाकिस्तान बनवा देने के बाद भी इन दोनों ने हिन्दुओं के हितों की रक्षा करने के बजाए हिन्दुओं के नाक में दम करने के लिए उन अलगावबादियों के वंशजों को देश में रख लिया जो देश विभाजन की असली जड़ थे व अपने हिन्दुविरोधी-देशविरोधी होने का परिचय दिया।

clip_image001[2] आज हिन्दू जानना चाहता है कि अगर हिन्दू-मुस्लिम एक साथ रह सकते थे तो देश का विभाजन क्यों करबाया गया ? और नहीं रह सकते थे तो उन्हें देश में क्यों रखा गया ?

वे कितने दूरदर्शी थे इसका पता आज आए दिन देश के विभिन्न हिन्दुबहुल क्षेत्रों में होने वाले बम्बविस्फोटों व मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में होने वाले दंगों से पता चलता है। काश ! उन्होंने बकिंम चन्द्र चटर्जी जी द्वारा लिखित उपन्यास आनंदमठ पढ़ा होता(सैकुलर गिरोह में सामिल हिन्दुओं को ये उपन्यास जरूर पढ़ना चाहिए) तो शायद वो ये गलती न करते और भारत के सर्बमान्य नेता होते और आज हिन्दू इस तरह न मारे जाते।

हम इस बात को यहां स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हम निजी तौर पर मोहन दास जी की आर्थिक सोच व उनकी सादगी के कट्टर समर्थक हैं जिसमें उन्होंने स्वदेशी की खुलकर बकालत की । पर क्या नेहरू जी को यह सोच पसन्द थी ? नहीं न । कुर्सी की दौड़ में ईसाईयत की शिक्षा प्राप्त नेहरू जी मांउटबैटन की यारी व कुर्सी की दौड़ में इनसानित और देशभक्ति छोड़कर वो सब कर बैठे जो देशद्रोही गद्दार मुस्लिम जिहादियों और सम्राज्यबादी ईसाईयों के हित में व हिन्दुस्थान और हिन्दुओं के विरोध में था ।

कई बार मन यह सोचने पर मजबूर होता है कि मोहन दास जी के नाम जितनी भी बदनामियां हैं उन सबके सूत्रधार नेहरू जी थे । जिन हालात में मोहन दास जी के शरीर को खत्म किया गया उसके सूत्रधार भी कहीं न कहीं नेहरू जी ही थे क्योंकि नेहरू जी प्रधानमन्त्री थे, गांधी जी सुरक्षा की जिम्मेदारी उनकी थी और उनके खत्म होने का सबसे ज्यादा फायदा नेहरू परिवार ने ही उठाया। जिसके मोहन दास जी कटर विरोधी थे क्योंकि उन्होंने तो देश विभाजन के बाद ही कांग्रेस को समाप्त करने का आग्रह किया था जिसके नेहरू जी विरूद्ध थे अब जरा सोचो मोहन दास जी को किसने खत्म करवाया ?

क्या आपको याद है कि जब 1948 में पाकिस्तानी सेना ने कबाइली जिहादियों के वेश में भारत पर हमला किया तब भी नेहरू जी की भूमिका भारत विरोधी ही रही। यह वही नेहरू जी हैं जो पटेल जी के लाख समझाने के बावजूद, इस हमले का मुकाबला कर मुस्लिम जिहादी आक्रांताओं को मार भगाने के बजाए संयुक्तराष्ट्र में ले गए ।

यह वही नेहरू जी हैं जिन्होंने संयुक्तराष्ट्र की बैठक में पटेल जी के रोकने के बाबजूद, पाकिस्तान द्वारा कब्जे में लिए गए जम्मू-कश्मीर के हिस्से को बार-बार आजाद कश्मीर कहा जिसका खामियाजा भारत आज तक भुक्त रहा है। अब आप ही बताइए कि आज जम्मू-कश्मीर में मुसलमानों द्वारा मारे गये या मारे जा रहे निर्दोष हिन्दुओं व शहीद हो रहे सैनिकों के कत्ल के लिए कांग्रेस व नेहरू जी को जिम्मेवार क्यों न ठहराया जाए ?

यह वही नेहरू जी हैं जिन्होंने हिन्दुविरोधीयों को खुश करने के लिए कहा था ‘ मैं दुर्घटनावश हिन्दू हूँ ’।

आपको यह जान कर हैरानी होगी कि पचास के दशक में आयुद्ध कारखानों में नेहरू जी का जोर हथियारों की जगह सौंदर्य-प्रसाधन बनवाने पर ज्यादा था । जिसके विरूद्ध तत्कालीन राष्ट्रपति डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद जी ने नेहरू जी को पत्र लिखकर चेताया भी था । पर नेहरू जी तो कबूतर की तरह आँखें बन्द किए हुए कहते फिर रहे थे, हमारे ऊपर कोई हमला नहीं कर सकता । वे कितने दूरदर्शी थे इसका पता 1962 में ही लग गया,जब हथियारों की कमी के कारण हमारे बहादुर सैनिकों को शहीद होना पड़ा और भारत युद्ध हार गया। हमारी मातृभूमि के एक बड़े हिस्से पर चीन ने कब्जा कर लिया।आओ उन शहीदों को हर पल प्रणाम करने का प्रण करें । काश नेहरू जी को पता होता कि शान्ति बनाए रखने का एकमात्र उपाय है युद्ध के लिए तैयार रहना।

Ø कांग्रेस का इस्लांम में व्याप्त बुराई यों का समर्थन करना व उन्हें बढ़ाबा देने का इतिहास कोई नया नहीं है यह मामला शुरू होता है तुर्की में चलाए जा रहे खिलाफत आन्दोलन के समर्थन से । बाद में ये कांग्रेस जन्म देती है जिन्ना जैसे नेताओं को, जो आगे चलकर पाकिस्तान की माँग उठाते हैं, कांग्रेस मुसलमानों के लिए पाकिस्तान बनवाती है, इस दौरान जिहादी मुसलमान हिन्दुओं पर जगह-जगह हमला करते हैं, हिन्दू मारे जाते हैं परन्तु कांग्रेस यह सुनिश्चित करने का भरसक प्रयास करती है कि कोई मुस्लिम जिहादी आतंकी न मारा जाए ।

Ø मानो इतने हिन्दुओं का खून पी लेने के बाद भी इस कांग्रेस नामक डायन की प्यास न बुझी हो इसलिए इस डायन ने यह सुनिश्चित किया कि भारत के हिन्दुओं वाले हिस्से को हिन्दूराष्ट्र न बनने दिया जाए । इस कांग्रेस नामक डायन द्वरा यह भी सुनिश्चित किया गया कि भविष्य में हिन्दू सुखचैन से न जी सकें और कांग्रेस का वोट बैंक भी चलता रहे । अपने इस मकसद को पूरा करने के लिए कांग्रेस ने भारत का विभाजन करवाने वाली, देशद्रोही जिहादी औंरगजेब और बाबर की संतानों को, यहां रख लिया ताकि हिन्दूराष्ट्र भारत में हिन्दुओं का खून पानी की तरह बहाया जाता रहे ।

Ø अब आप ही फैसला करें कि भारत में मुस्लिम जिहादी आतंकवादियों द्वारा भारतीय संस्कृति के प्रतीक दर्जनों मन्दिरों पर किए जा रहे हमलों, मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में हिन्दुओं को चुन चुन कर मार कर या हिन्दुबहुल क्षेत्रों में बम्बविस्फोट करके चलाए जा रहे हिन्दू मिटाओ अभियान के लिए कांग्रेस को जिम्मेवार क्यों न माना जाए ?

Ø अगर जिम्मेवार ठहराया जाए जो कि है तो क्यों न उसके विरूद्ध देशब्यापी गद्दार मिटाओ अभियान चलाकर उसी के बापू द्वारा 1947 में लिए गए कांग्रेस मिटाओ के निर्णय को आज 2009 से शुरू कर 2020 से पहले-पहले पूरा किया जाए ।

जिन दो नेताओं की क्राँतिविरोधी हिन्दुविरोधी मुस्लिमपरस्त षड्यन्त्रकारी सोच के चलते कई क्रांतिकारी शहीद होकर भी हिन्दूस्थानी जनता के अखण्ड भारत के स्वप्न को पूरा न कर सके । उन्हीं दो नेताओं में से कांग्रेसियों ने एक को अपना बापू व दूसरे को अपना चाचा बना लिया( उन दोनों की आत्मा से हम क्षमा मांगते हैं अगर उनकी कोई ऐसी मजबूरियां रहीं हों जो हम नहीं समझ पा रहे हैं । ये सबकुछ हम हरगिज न लिखते अगर मोहन दास जी की बात मान कर कांग्रेस को बिसर्जित कर दिया गया होता । तो न यह कांग्रेस इस तरह भगवान राम के अस्तित्व को नकारती, न देशद्रोह के मार्ग पर आगे बढ़ती। बेशक उनकी मजबूरियां रही हों पर आज की कांग्रेस की कोई मजबूरी नहीं है इसके काम स्पष्ट देशद्रोही और हिन्दुविरोधी हैं ये हम सब हिन्दू देख सकते हैं ) ।

फिर प्रचार के हर साधन व सरकारी तन्त्र का दुरूपयोग कर इन्हें सारे देश का बापू व चाचा प्रचारित करने का असफल प्रयत्न किया गया । यह देश को कांग्रेस की हिन्दुविरोधी-देशविरोधी जिहाद व धर्मांतरण समर्थक सोच का गुलाम बनाने जैसा था ।

प्रश्न ये भी उठता है कि जिस देश की सभ्यता संस्कृति इस दुनिया की सबसे प्राचीनतम हो व जिस देश के साधारण राजा अशोक महान जी व विक्रमादित्य जी को हुए 2000 वर्ष से अधिक हो चुके हों क्या ऐसे देश का बापू या चाचा 79 वर्ष का हो सकता है ?

नहीं ,न । वैसे भी जिस देश के आदर्श मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्री राम हों, उस देश को किसी छदम राजनीतिज्ञ या मझे हुए विस्वासघाती राजनीतिज्ञ को- वो भी उसे जो कभी खुलकर भारतीय संस्कृति का सम्मान न कर पाया हो- ऐसा स्थान देने की आवश्यकता ही क्या है ?

अगर आपको ये बात समझ नहीं आ रही है तो आप जरा ईराक के बारे में सोचिए । सद्दाम हुसैन बेशक मुसलमान था पर जिहादी नहीं था। वेशक तानाशाह था पर हमारे नेताओं की तरह देशद्रोही नहीं था । उसने अपने देश के साथ कभी गद्दारी नहीं की । उसने जो भी किया देशहित में किया । मतलब वो पक्का देशभक्त मुसलमान था । उसने कभी विदेशी अंग्रेज ईसाईयों की गुलामी स्वीकार नहीं की । दूसरी तरफ ईराक के कुछ सद्दाम विरोधी गद्दारों ने अंग्रेज ईसाईयों के साथ मिलकर उसके विरूद्ध देश हित के विपरीत काम किया । परिणाम ईराक में देशभक्त सद्दाम को फाँसी चढ़ाकर अंग्रेजों ने सत्ता इन गद्दारों को सौंप दी । यही सब कुछ अफगानिस्तान में किया गया वहां के देशभक्त शासक को हटाने के लिए तालिबान को पाला गया फिर तालिबान को हटाकर वहां पर अंग्रेज ईसाईयों ने ईसाईयों के बफादार व्यक्ति को शासक बना दिया ।

यही सबकुछ भारत में घटा था यहां भी सत्ता नेताजी सुभाषचन्द्र वोस, पटेल जी या वीर साबरकर जैसे किसी देशभक्त को न सौंपकर अंग्रेज ईसाईयों के प्रति बफादार हिन्दुविरोधी को सौंपी गई। जिसका परिणाम यह हुआ कि मैकाले द्वारा बनाई गई हिन्दुविरोधी ईसाई समर्थक शिक्षा नीति व कानून आज भी चालू है । आज भी भारत का नाम भारतीयों द्वारा दिया गया भारत नहीं, बल्कि अंग्रेज ईसाईयों द्वरा दिया गया गुलामी का प्रतीक इंडिया प्रचलित है ।

आज भी भारत में किसी ईसाई या मुस्लिम के मरने पर तो जिहाद व धर्मांतरण समर्थक गिरोह मातम मनाता है पर हिन्दू के शहीद होने पर इस गिरोह द्वारा खुशियां मनाइ जाती हैं । ईसाई पोप के मरने पर राष्ट्रीय शोक घोषित किया जाता है। साधु सन्तों को यातनांयें दी जाती हैं, अपमानित किया जाता है। देश में हजारों हिन्दुओं का खून बहाने वाले जिहादियों को बचाने के लिए कठोर कानून का विरोध किया जाता है और जिहादियों के हमलों से बचाने के लिए हिन्दुओं को जागरूक कर संगठित करने वाली देशभक्त बीरांगना साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, उसके देशभक्त सहयोगियों व सेना के अधिकारीयों को जेल में डाला जाता है । आतंकवादी कहकर अपमानित करने का प्रयास किया जाता है । जबकि आँध्रप्रदेश में हिन्दुबहुल क्षेत्रों में बम्बविस्फोट के आरोपियों को जेल से छोड़कर ईसाई कांग्रेसी मुख्यमन्त्री द्वारा तोहफे में आटोरिक्सा दिए जाते हैं !

§ हमें बड़ी हैरानी होती है जब हम किसी को 15 अगस्त 1947 को भारत का स्वतन्त्रता दिवस कहते हुए सुनते हैं । क्योंकि सच्चाई यह है कि इस दिन भारत को तीन टुकड़ों मे बांटा गया था, दो मुसलमानों को लिए (वर्तमान पाकिस्तान व बांगलादेश), एक हिन्दुओं के लिए (वर्तमान भारत) । पाकिस्तान व बांगलादेश में जो हिन्दू रह गए थे वो आज गिने-चुने रह गए हैं बाकी या तो इस्लाम अपनाने पर बाध्य कर दिय गए,भगा दिए गये या जिहादियों द्वारा जन्नत पाने के लिए हलाल कर दिए गये व किए जा रहे हैं लेकिन भारत में जो मुसलमान रह गए थे वो आज 300% से भी अधिक हो गए हैं और मुस्लिम जिहादी आतंकवादियों को शरण, सहायता व सहयोग देकर हिन्दुओं का कत्ल करवा रहे हैं।

§ क्योंकि पाकिस्तान व बांगलादेश की तरह भारत में भी शासन हिन्दुविरोधी जिहाद समर्थकों ने किया और हिन्दुविरोधी कानून बनाकर हिन्दुओं को अपूर्णीय क्षति पहुँचाई ।आज भारत में ही जिहादी आतंकवाद जारी है देश के विभिन्न हिस्सों में जिहादियों द्वारा हिन्दुबहुल क्षेत्रों,मन्दिरों ,सेना ब पुलिस की गाड़ियों व कैंपों में बम्बविस्फोट कर हजारों हिन्दू मारे जा चुके हैं। इन मुस्लिम जिहादियों द्वारा इतने निर्दोश हिन्दुओं का कत्ल कर देने के बावजूद जिहाद समर्थक सैकुलर हिन्दुविरोधी देशद्रोही गिरोह का जिहादियों को समर्थन आज भी जारी है ।

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